Saturday, May 9, 2020

Tomoto

टमाटर विश्व में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली सब्जी है। इसका पुराना वानस्पतिक नाम लाइकोपोर्सिकान एस्कुलेंटम मिल है। वर्तमान समय में इसे सोलेनम लाइको पोर्सिकान कहते हैं। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो बिना टमाटर के खाना बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते।[2] इसकी उत्पति दक्षिण अमेरिकी ऐन्डीज़ में हुआ। मेक्सिको में इसका भोजन के रूप में प्रयोग आरम्भ हुआ और अमेरिका के स्पेनिस उपनिवेश से होते हुये विश्वभर में फैल गया।
टमाटर
Tomatoes-on-the-bush.jpg
पौधे में लगे हुए पके टमाटर के फल
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत:पादप
अश्रेणीत:एंजियोस्पर्म
अश्रेणीत:एकबीजपत्री
गण:Solanales
कुल:Solanaceae
वंश:Solanum
जाति:S. lycopersicum
द्विपद नाम
Solanum lycopersicum
L.
पर्यायवाची
Lycopersicon lycopersicum
Lycopersicon esculentum[1]

टमाटर के तत्वसंपादित करें

समूचा टमाटर (ऊपर) व बीच से कटे हुए उसके दो भाग (नीचे)
टमाटर में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन सी पाये जाते हैं। एसिडिटी की शिकायत होने पर टमाटरों की खुराक बढ़ाने से यह शिकायत दूर हो जाती है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] हालाँकि टमाटर का स्वाद अम्लीय (खट्टा) होता है, लेकिन यह शरीर में क्षारीय (खारी) प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है। लाल-लाल टमाटर देखने में सुन्दर और खाने में स्वादिष्ट होने के साथ पौष्टिक होते हैं। इसके खट्टे स्वाद का कारण यह है कि इसमें साइट्रिक एसिड और मैलिक एसिड पाया जाता है जिसके कारण यह प्रत्यम्ल (एंटासिड) के रूप में काम करता है। टमाटर में विटामिन 'ए' काफी मात्रा में पाया जाता है। यह आँखों के लिये बहुत लाभकारी है।{{cn} टमाटर फल में रंगद्रव्य लाल रंग के टमाटर की तुलना में नारंगी रंग के टमाटर में लायकोपिन यह रंगद्रव्य शरीर में सहजरुप से शोषित होते हैं। लाल रंग के टमाटर में लायकोपिन यह रंगद्रव्य टेत्रा-सिस्(?) में उपलब्ध होता है।वह शरीर में सहजरुप से अवशोषित होते नहीं है।
टोमॅटोचे महत्त्व व प्रक्रिया उद्योग

टमाटर का उपयोगसंपादित करें

शरीर के लिए टमाटर बहुत ही लाभकारी होता है। इससे कई रोगों का निदान होता है। टमाटर शरीर से विशेषकर गुर्दे से रोग के जीवाणुओं को निकालता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] यह पेशाब में चीनी के प्रतिशत पर नियन्त्रण पाने के लिए प्रभावशाली होने के कारण यह मधुमेह के रोगियों के लिए भी बहुत उपयोगी होता है। कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होने के कारण इसे एक उत्तम भोजन माना जाता है। टमाटर से पाचन शक्ति बढ़ती है। इसके लगातार सेवन से जिगर बेहतर ढँग से काम करता है और गैस की शिकायत भी दूर होती है। जो लोग अपना वजन कम करने के इच्छुक हैं, उनके लिए टमाटर बहुत उपयोगी है। एक मध्यम आकार के टमाटर में केवल 12 कैलोरीज होती है, इसलिए इसे पतला होने के भोजन के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसके साथ साथ यह पूरे शरीर के छोटे-मोटे विकारों को भी दूर करता है। टमाटर के नियमित सेवन से श्वास नली का शोथ कम होता है। प्राकृतिक चिकित्सकों का कहना है कि टमाटर खाने से अतिसंकुचन भी दूर होता है और खाँसी तथा बलगम से भी राहत मिलती है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
टमाटर

टमाटर की चटनीसंपादित करें

भारत में बेहद लोकप्रिय टमाटर की चटनी को बहुत ही कम समय में बनाया जा सकता है। यह चटनी नाश्ते में समोसे, आलू बड़ा, पकोड़े, बड़े, डबलरोटी आदि के साथ आसानी से खायी जा सकती है। वैसे टमाटर की मीठी चटनी टुमैटो कैचप या सॉस के रूप में आम बाज़ार में भी मिलती है। अब तो इसका व्यावसायिक दृष्टि से उत्पादन भी होने लगा है। इसका प्रयोग ज्यादा से ज्यादा नाश्ते की चटनी बनाने किया जाता है

Tuesday, May 5, 2020

कुस्ती

कुश्ती
कुश्ती
विवरण'कुश्ती' एक प्रकार का द्वंद्वयुद्ध है, जो बिना किसी शस्र की सहायता के केवल शारीरिक बल के सहारे लड़ा जाता है। पुराणों में इसका उल्लेख मल्लक्रीड़ा के रूप में मिलता है।
शुरुआतकुश्ती का आरंभ संभवत: उस युग में हुआ, जब मनुष्य ने शस्त्रों का उपयोग नहीं जाना था। उस समय इस प्रकार के युद्ध में पशु बल ही प्रधान था। पशु बल पर विजय पाने के लिए मनुष्य ने विविध प्रकार के दाँव पेंचों का प्रयोग सीखा होगा और उससे मल्ल युद्ध अथवा कुश्ती का विकास हुआ होगा।
सदस्यदो (2)
स्थलबड़ा मैदान
श्रेणियाँफ्लाई वेट, बैंटेम वेट, फेदर वेट, लाइट वेट, वेल्टर वेट, मिडिल वेट, लाइट हेवी वेट, हेवी वेट।
भारतीय पहलवानगामा पहलवानदारा सिंहगुरु हनुमानसतपाल सिंहसुशील कुमार पहलवानधीरज ठाकरान
संबंधित लेख'भीमसेनी', 'हनुमंती', 'जांबवंती', 'जरासंधी, 'फ्री स्टाइल कुश्ती', 'सूमो कुश्ती', 'अमरीकन फ्री स्टाइल मल्लयुद्ध', 'श्विंजेन मल्लयुद्ध' आदि।
अन्य जानकारीमध्य काल भारतीय मल्लयुद्ध पद्धति का मुस्लिम देशों की युद्ध पद्धति के साथ समन्वय हुआ। यह समन्वय विशेष रूप से मुग़ल काल में हुआ। बाबर मध्य एशिया में प्रचलित कुश्ती पद्धति का कुशल और बलशाली पहलवान था। अकबर भी इस कला का अच्छा जानकार था। उसने उच्चकोटि के मल्लों को राजाश्रय प्रदान कर कुश्ती कला को प्रोत्साहित किया।






















कुश्ती (अंग्रेज़ी:Kushti) एक प्रकार का द्वंद्वयुद्ध है, जो बिना किसी शस्त्र की सहायता के केवल शारीरिक बल के सहारे लड़ा जाता है। इसमें प्रतिद्वंद्वी को बिना अंगभंग किए या पीड़ा पहुँचाए परास्त किया जाता है। पुराणों में इसका उल्लेख मल्लक्रीड़ा के रूप में मिलता है। इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इसके प्रति उन दिनों विशेष आकर्षण और आदर था। मध्य काल में मुस्लिम साम्राज्य और संस्कृति के प्रसार के साथ भारतीय मल्लयुद्ध पद्धति का मुस्लिम देशों की युद्ध पद्धति के साथ समन्वय हुआ। यह समन्वय विशेष रूप से मुग़ल काल में हुआ। आधुनिक काल में देशी रजवाड़ों ने कुश्ती कला को संरक्षण प्रदान किया। पटियालाकोल्हापुरमैसूरइंदौरअजमेरबड़ौदाभरतपुरजयपुरबनारसदरभंगा, बर्दवान, तमखुई[1] के राजाओं के अखाड़ों की देशव्यापी ख्याति रही है। वहाँ कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों को हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं और इन अखाड़ों के नामी पहलवान देश में घूम-घूम कर कुश्ती के दंगलों में भाग लेते और कुश्ती का प्रचार किया करते थे।

Saturday, May 2, 2020

Baaz ka raj



बाज एक विशालकाय पक्षी होता है, जो लोगों के बीच एक रहस्यमई पक्षी के रूप में जाना जाता है।
इस लेख में हम बाज पक्षी के बारे में जानकारी और कुछ तथ्य पेश करेंगे।

बाज पक्षी के बारे में जानकारी

  1. एक बाज का वजन:
    7.5 फीट तक के पंख और 3.5 फीट तक की ऊंचाई के बावजूद, एक सामान्य मेल बॉल्ड(bald) ईगल का वजन केवल 9 पाउंड ही होता है
  2. 100,000 से अधिक बाज मारे गए:
    अलास्का सैल्मन मछुआरे का डर था कि बाज सैल्मन आबादी के लिए खतरा थे। नतीजतन, 1917 से 1953 तक अलास्का में 100,000 से अधिक बाल्ड(bald) ईगल मारे गए।
  3. 150 वर्षो का घोसला:
    सालाना पुनर्निर्माण के बजाय सफेद पूंछ वाले ईगल अक्सर अपने घोंसले का पुन: उपयोग करते हैं। आइसलैंड में सफेद पूंछ वाले एक ईगल परिवार ने 150 वर्षों तक एक ही घोसले का पुनरुपयोग किया था।
  4. रेगिस्तानी ईगल:
    किसी भी सैन्य या कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा रेगिस्तानी ईगल का उपयोग नहीं किया जाता है।
  5. गोल्डन ईगल:
    गोल्डन ईगल नवजात कैरिबू को मार और खा सकता है।
  6. स्कैंडिनेविया में बाज:
    स्कैंडिनेविया में ईगल अपने घोंसले को इतना भारी बनाते हैं; की पेड़ गिरने का कारण जाने जाते हैं।
  7. बाज:
    ईगल्स चट्टानों से फेंक कर पहाड़ी बकरियों को मार डालते हैं।
  8. कोलोराडो की ईगल रिपोजिटरी:
    कोलोराडो में एक राष्ट्रीय ईगल रिपोजिटरी है, जहां मृत बाल्ड और सुनहरे ईगल लाए जाते हैं, और फिर उनके हिस्सों को औपचारिक उद्देश्यों के लिए मूल अमेरिकी जनजातियों में फिर से वितरित किया जाता है।
  9. गोल्डन ईगल्स:
    ग्रीस में गोल्डन ईगल्स कछुए खाते हैं; वे ऊंचे उड़कर कछुओं को नीचे चट्टानों पर फेंक देते है ताकि उनका शैल टूट सके।
  10. दिमाग से बड़ी आंखें:
    वजन के हिसाब से, ईगल, हॉक्स और फाल्कन जैसे पक्षियों के पास उनके दिमाग से बड़ी उनकी आंखें होती हैं।
  11. स्प्रेड ईगल:
    ‘स्प्रेड ईगल’ शब्द का अर्थ दो-सिर वाली ईगल की हेराल्ड्री से है।
  12. ईगल्स की प्रजातियां:
    वर्तमान में, ईगल्स की लगभग 60 प्रजातियां हैं। उनमें से ज्यादातर यूरेशिया और अफ्रीका में रहते हैं, लेकिन कुछ प्रजातियों को अमेरिका और साथ ही ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जा सकता है।
  13. दुनियां के सबसे बड़े बाज:
    दुनिया के सबसे बड़े बाज(जैसे हार्पी ईगल और फिलीपीन ईगल) में 250 सेमी (8 फीट) से अधिक का पंख होता है और उन्हें हिरण, बकरियों और बंदरों के रूप में बड़े शिकार को मारने और बंद करने के लिए जाना जाता है।
  14. मादा ईगल:
    अधिकांश ईगल प्रजातियों में, मादाएं पुरुषों की तुलना में बड़ी और मजबूत होती हैं।
  15. मार्शल ईगल:
    मार्शल ईगल जैसे कुछ ईगल, एक सिंगल विंग बीट के बिना लंबे समय तक बढ़ने में सक्षम होते हैं। वे ऐसा करने के लिए थर्मल (गर्म उगते हवा के कॉलम) का उपयोग करते हैं।
  16. सबसे भारी ईगल:
    स्टेलर समुद्री ईगल, 9 किलो (20 पौंड) से अधिक वजन के साथ दुनिया में सबसे भारी ईगल है।
  17. ईगल की आंखें:
    ईगल्स की आंखों में प्रति वर्ग मिमी प्रति मिलियन प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएं होती हैं, जो मनुष्यों की तुलना में पांच गुना अधिक होती हैं। इंसान सिर्फ तीन मूल रंग देखते हैं जबकि ईगल पांच देखते हैं।
  18. सबसे बड़ा ईगल:
    लंबाई में 102 सेमी (3.35 फीट) और 8 किलो (17.6 पाउंड) वजन , फिलीपीन ईगल दुनिया में सबसे बड़ा, भारी और सबसे मजबूत ईगल है। दुर्भाग्य से, यह सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है क्योंकि यह गंभीर रूप से लुप्तप्राय है। फिलीपींस (जहां यह राष्ट्रीय पशु है) में इस पक्षी को मारना स्थानीय कानून के तहत जेल में 12 साल तक दंडनीय है।
  19. सबसे बड़ा घोसला:
    आज तक का पशु प्रजाति के लिए दर्ज सबसे बड़ा पेड़ घोंसला बाल्ड ईगल द्वारा बनाया गया था। यह 4 मीटर (13 फीट) गहरा, 2.5 मीटर (8.2 फीट) चौड़ा था, और वजन में 1 मीट्रिक टन (1.1 छोटा टन) था।
  20. ईगल सबसे बुद्धिमान पक्षी:
    ईगल बहुत बुद्धिमान पक्षी माना जाता हैं।
  21. बैठे बैठे सो जाना:
    घोड़ों की तरह, जो खड़े होने पर सो सकते हैं, ईगल के पास भी उनके पैरों में एक विशेष तंत्र होता है जो उन्हें स्थिति में बंद करने की अनुमति देता है ताकि वे शाखा में बैठे बैठे ही सो सकें।
  22. ईगल्स के समूह:
    ईगल्स को अनौपचारिक रूप से चार समूहों में विभाजित किया जाता है: मछली ईगल (मुख्य रूप से मछली पर फ़ीड), ईगल (पंख वाले निचले पैर होते हैं), सांप ईगल (शिकार सरीसृप), और हार्पी ईगल (उष्णकटिबंधीय जंगल में रहते हैं)।
  23. 7000 पंख:
    ईगल्स में 7,000 पंख होते हैं जो उनके शरीर द्रव्यमान का लगभग 5% हिस्सा खाते हैं।
  24. ईगल के पंख:
    ईगल के पंखों में वास्तव में एक हवाई जहाज के पंखों की तुलना में अधिक शक्ति और ताकत होती है।
  25. पक्षियों का राजा ईगल:
    ईगल को हमेशा पक्षियों के राजा के रूप में माना जाता है, इसकी बड़ी ताकत, रैपिडिटी और उड़ान की ऊंचाई, प्राकृतिक क्रूरता और आतंक के कारण।
  26. ईगल की सबसे छोटी प्रजाति:
    ईगल की सबसे छोटी प्रजातियां दक्षिण निकोबार सर्प ईगल (स्पिलोर्निस क्लोसी) 450 ग्राम (0.9 9 पाउंड) और 40 सेंटीमीटर (16 इंच) पर हैं।
  27. ईगल का विशेष पाचन अंग:
    ईगल्स को हर दिन खाने की ज़रूरत नहीं है। उनके पास एक विशेष पाचन अंग होता है जिसे फसल के रूप में जाना जाता है, जो पेट में इसके लिए जगह होने तक भोजन संग्रहीत करता है।

Friday, May 1, 2020

Wheat

गेहूं (Wheat ; वैज्ञानिक नाम : Triticum aestivum.), मध्य पूर्व के लेवांत क्षेत्र से आई एक घास है जिसकी खेती दुनिया भर में की जाती है। ... यह घास कुल का पौधा है गेहूं के दाने और दानों को पीस कर प्राप्त हुआ आटा रोटी, डबलरोटी (ब्रेड), कुकीज, केक, दलिया, पास्ता, रस, सिवईं, नूडल्स आदि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।



Wheat (गेहूं)

गेहूँ (Wheat ; वैज्ञानिक नाम : Triticum spp.) मध्य पूर्व के लेवांत क्षेत्र से आई एक घास है जिसकी खेती दुनिया भर में की जाती है। विश्व भर में, भोजन के लिए उगाई जाने वाली धान्य फसलों मे मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाले फसल है, गेहूँ की उपज लगातार बढ रही है। यह वृध्दि गेहूँ की उन्नत किस्मों तथा वैज्ञानिक विधियों से हो रही है। भारत गेहूं का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है केरल, मणिपुर व नागालैंड राज्यों को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों में इस की खेती की जाती है उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व पंजाब सर्वाधिक रकबे में गेहूं की पैदावार करने वाले राज्य हैं। 

खेत की तैयारी:- गेहूं की बोआई से करीब 1 महीने पहले ही प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 4 से लेकर 10 टन तक गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद खेत में डाल देनी चाहिए। इसमें 3 किलोग्राम कैलडर्मा व 10 किलोग्राम कैलबहार भी डालना बेहतर होता है। इसके बाद खेत की जुताई कर के पलेवा कर देना चाहिए। फिर हैरो व टिलर से जुताई कर के पाटा लगा कर खेत को पूरी तरह से समतल कर देना चाहिए। बोआई के वक्त खेत में थोड़ी नमी होना जरूरी है। मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए और खेत में खरपतवार नहीं होने चाहिए।

बुआई का समय, तरीका एवं बीज की मात्रा :-

1. असिंचित(Unirrigated):- असिंचित गेहूँ ही बुआई का समय 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर है इस अवधि में बुआई तभी संभव है जब सितम्बर माह में पर्याप्त वर्षा हो जाती हैं। इससे भूमि में आवश्यक नमी बनी रहती हैं। यदि बोये जाने वाले बीज के हजार दानों (1000 दानों) का वजन 38 ग्राम है तो 100 किलो प्रति हेक्टेयर बीज प्रयोग करें। हजार दानों का वजन 38 ग्राम से अधिक होने पर प्रति ग्राम 2 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा बढ़ा दें।

2. सिंचित:- सामयिक बोनी जिसमें नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा उत्तम होता है, 15-25 नवम्बर तक सिंचित एवं समय वाली जातियों की बोनी आवश्यक कर लेना चाहिये। बीज को बोते समय 2-3 से.मी. की गहराई में बोना चाहिये जिससे अंकुरण के लिये पर्याप्त नमी मिलती रहे। कतार से कतार की दूरी 20 से.मी. रखना चाहिये। इस हेतु बीज की मात्रा औसतन 100 कि.ग्राम/ हे. रखना चाहिये या बीज के आकार के हिसाब से उसकी मात्रा का निर्धारण करें तथा कतार से कतार की दूरी 18 से.मी. रखें।

3. सिंचित एवं देर से बोनी हेतु:- पिछैती बोनी जिसमें दिसम्बर का पखवाड़ा उत्तम हैं। 15 से 20 दिसम्बर तक पिछैती बोनी अवश्य पूरी कर लेना चाहिये। पिछैती बुवाई में औसतन 125 किलो बीज प्रति हे. के हिसाब से बोना उपयुक्त रहेगा (देर से बोनी के लिये हर किस्म के बीज की मात्रा 25 प्रतिशत बढ़ा दें) तथा कतार की दूरी 18 से.मी. रखें।

सिंचाई:- गेहूँ की बौनी किस्मों को 30-35 हेक्टेयर से.मी. और देशी किस्मों  को 15-20 हेक्टेयर से.मी. पानी की कुल आवश्यकता होती है। उपलब्ध जल के अनुसार गेहूँ में सिंचाई क्यारियाँ बनाकर करनी चाहिये। प्रथम सिंचाई में औसतन 5 सेमी. तथा बाद की सिंचाईयों में 7.5 सेमी. पानी देना चाहिए। सिंचाईयों की संख्या और पानी की मात्रा मृदा के प्रकार, वायुमण्डल का तापक्रम तथा बोई गई किस्म पर निर्भर करती है। फसल अवधि की कुछ विशेष क्रान्तिक अवस्थाओं पर बौनी किस्मों में सिंचाई करना आवश्यक होता है।

गेहूँ की खेती में सिंचाई: -
  • पहली सिंचाई बुवाई के 3 से 4 सप्ताह बाद दी जानी चाहिए।
  • बुवाई के 40 से 45 दिन बाद दूसरी सिंचाई करनी चाहिए।
  • बुवाई के 60 से 65 दिन बाद 3 सिंचाई।
  • बुवाई के 80 से 85 दिन बाद 4 सिंचाई करें।
  • बुवाई के 100 से 105 दिन बाद 5 वीं सिंचाई करें।
  • बुआई के 15 से 120 दिन बाद 6 वीं सिंचाई करें।
उपज एवं भंडारण:- उन्नत तकनीक से खेती करने पर सिंचित अवस्था में गेहूँ की बौनी किस्मो से लगभग 50-60 क्विंटल दाना के अलावा 80-90 क्विंटल भूसा/हेक्टेयर प्राप्त होता है। जबकि देशी लम्बी किस्मों से इसकी लगभग आधी उपज प्राप्त होती है। देशी किस्मो से असिंचित अवस्था में 15-20 क्विंटल प्रति/हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। सुरक्षित भंडारण हेतु दानों में 10-12% से अधिक नमी नहीं होना चाहिए। भंडारण के पूर्ण कठियों तथा कमरो को साफ कर लें और दीवालों व फर्श पर मैलाथियान 50% के घोल को 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर की दर से छिड़कें। अनाज को बुखारी, कोठिलों या कमरे में रखने के बाद एल्युमिनियम फास्फाइड 3 ग्राम की दो गोली प्रति टन की दर से रखकर बंद कर देना चाहिए।

Thursday, April 30, 2020

Swami vivekanand

जीवन परिचय : स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।
 
सन्‌ 1884 में विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।
 
रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंस जी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंस जी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंस जी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।
स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुंब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूंक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।
एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानंद को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।

 
गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।
 
25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।
 
 
फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहां के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।
 
'अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा' यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया। 4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया।

Tomoto

टमाटर  विश्व में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली सब्जी है। इसका पुराना वानस्पतिक नाम  लाइकोपोर्सिकान एस्कुलेंटम  मिल है। वर्तमान समय में इसे ...